This article was originally written in Hindi and published in The Wire Hindi. The key points of this article are presented in English below, followed by the original version of the story. For a full English version of this article, please click on the “Translate page with Google” button on the upper right-hand side.
Key Points
- Rajasthan, India, has over 90 lakh (9 million) pensioners. In 2023-2024, around 13 lakh (1.3 million) pensioners’ payments were “canceled,” citing their death or migration. But these included many who were wrongly declared “dead,” or shown as having left Rajasthan even when they were too old and too feeble to even step out of their homes.
- Officials in Jaipur said that of those declared “dead,” 95% of the decisions were done through automated processes using India’s biometric ID system, called Aadhaar.
- The government has hired private corporations to further automate the social security process by using machine learning to determine who gets welfare and who doesn’t. It also plans to monetize Big Data—data and metadata from public schemes—to corporations and let private companies pay for it.
- Activists contend that automation made it difficult especially for those from historically marginalized castes who lack digital access to merely prove that they were alive. Activists ask: “When the government has become merely a computer interface, if a software is not working, then does it mean that no one is accountable?”

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राजस्थान की कल्याणकारी योजनायें: तकनीक पर निर्भरता बढ़ा रही है कमज़ोर वर्ग की मुश्किलें
ऑनलाइन बायोमेट्रिक सत्यापन कई बार सेहत खराब होने, हाथ की लकीरों का या आंख का स्कैन न आने, स्मार्टफोन न होने इत्यादि वजहों से नहीं हो पाता है. इसकी वजह से कई पात्र नागरिकों को योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता. लेकिन प्रशासन डिजिटल तकनीक की सीमाओं को समझने को तैयार नहीं है.

राजस्थान में डिजिटल तकनीक के वृद्ध लोगों के जीवन पर पड़े दुष्प्रभाव पर दो लेखों की श्रृंखला का यह दूसरा और अंतिम भाग है. पहली क़िस्त यहां पढ़ सकते हैं.
भीलवाड़ा/अलवर: कांकू देवी भील, अजमेर ज़िले में देवाता पंचायत के कानपुरा चौराना गांव के किनारे एक कच्चे घर में रहती हैं. कांकू देवी विधवा हैं. उनके बेटे माधु की कैंसर से मृत्यु हो चुकी है. वह अपने पति के परिवार के साथ रहती हैं, जिसके सभी पुरुष रिश्तेदार काम के लिए बाहर चले गए हैं.
बताया गया कि पुरुष महाराष्ट्र में कुएं खोदते हैं, जबकि उनका 12 वर्षीय पोता पड़ोसी राज्य गुजरात के गांधीनगर में होटलों में मज़दूरी करता है.
आधार रिकॉर्ड के अनुसार 68 वर्षीय कांकू देवी को 500 रुपये मासिक पेंशन मिलती थी, लेकिन दिसंबर 2022 में यह बंद हो गई. राज्य के राशन रिकॉर्ड के अनुसार, यह परिवार ‘अंत्योदय‘ या सबसे गरीब श्रेणी में आता है.
जब कांकू देवी आधार से प्रमाणीकरण करने की कोशिश करती है, तो बायोमेट्रिक्स काम नहीं करता क्योंकि उनका हाथ कांपता है. जिनके बायोमेट्रिक्स स्कैन नहीं होते, उन्हें वन–टाइम पासवर्ड मिल सकता है, लेकिन कांकू देवी के पास मोबाइल फोन नहीं है.
राजस्थान में 90 लाख से ज़्यादा पेंशनर हैं. 2023-2024 में, लगभग 13 लाख के भुगतान उनकी मृत्यु या प्रवास का हवाला देते हुए ‘रद्द‘ कर दिए गए.
जैसा इस श्रृंखला की पहली रिपोर्ट ने दिखलाया, इनमें कई ऐसे भी थे जिन्हें ग़लती से ‘मृत‘ घोषित कर दिया गया था, या राजस्थान छोड़कर चला गया दिखा दिया था. जबकि वे इतने बूढ़े और कमज़ोर थे कि वह बिस्तर पर थे या अपने घरों से बाहर भी नहीं निकल सकते थे.
जयपुर में अधिकारियों ने बताया कि जिन लोगों को ‘मृत’ घोषित किया गया था, उनमें से 95% फ़ैसले ऑटोमैटेड या स्वचालित प्रक्रियाओं के ज़रिए लिए गए.
2022 के बाद, राज्य सरकार ने डिजिटल जांच को और कड़ा कर दिया, जिसमें न केवल आधार प्रमाणीकरण, बल्कि जन आधार को राज्य डेटाबेस नामांकन में अनिवार्य रूप से दिखाना भी शामिल था, और दोनों डेटासेट को सिंक कर दिया. इससे विसंगतियां पैदा हुईं और बिना किसी समाधान के आवेदन रद्द कर दिए गए.
अधिकारियों का कहना है कि एक बार पेंशन बंद हो जाने के बाद, व्यक्ति के जन आधार (आधार से बना राज्य डेटाबेस जिस में नाम होना सब कल्याणकारी योजना के लिए आवश्यक बना दिया गया है) डेटा की पुष्टि किए बिना उसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता.
कांकू देवी भील की मदद कर रहे स्थानीय कार्यकर्ता रणजीत सिंह ने बताया कि हालांकि उनके पति किसना राम की मृत्यु हो चुकी है, फिर भी उनका नाम उनके जन आधार या घरेलू पहचान पत्र के रिकॉर्ड में दर्ज है. राम की मृत्यु 7 जनवरी, 2018 को हुई थी.
कांकू देवी अकेली नहीं हैं जो ये समस्याएं झेल रही हैं.
ग्राम और ब्लॉक अधिकारियों ने कहा कि ऑनलाइन बायोमेट्रिक सत्यापन कई बार सेहत खराब होने, हाथ की लकीर या आंख का स्कैन न आने, स्मार्टफोन न होने इत्यादि वजहों से नहीं हो पाता है.

देवता पंचायत में ग्रामीण विकास योजनाओं का क्रियान्वयन करने वाले नरेगा रोज़गार सेवक कैलाश चंद ने बताया कि लगभग 10% पात्र लोगों को ऑनलाइन सत्यापन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. लेकिन स्थानीय स्तर पर कोई भी राहत प्रदान करना बहुत मुश्किल है.
देवता पंचायत की सरपंच पानी देवी ने कहा, ‘एक बार पेंशन रद्द हो जाने के बाद, हमारे अधिकार नहीं बचते, भले ही व्यक्ति हमारे सामने खड़ा हो.‘
उदाहरण के लिए, राजसमंद जिले के भीम खंड के विकास अधिकारी ने राजधानी जयपुर में बैठे अधिकारियों को कई पत्र भेजकर लोगों की पेंशन दस्तावेजों को बहाल करने का अनुरोध किया. एक पत्र में कहा गया है कि बार ‘गंगादेवी‘ का नाम बदलकर ‘गंगा सिंह‘ कर दिया गया है. उनका लिंग गलती से महिला से पुरुष में बदल गया है.
इसी तरह भीम पंचायत में, छोग सिंह पेंशन का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि पेंशन रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि 99 वर्ष है, जबकि जन आधार के अनुसार उनकी आयु 88 वर्ष है. पर गरीबी रेखा से नीचे के वृद्धों के लिए पेंशन की पात्रता केवल आयु 58 वर्ष है.

जब जयपुर में ऑनलाइन सत्यापन में छोटी-छोटी विसंगतियों से आने वाली शिकायतों की बाढ़ आ गई, आईटी विभाग के राजकॉम्प इन्फो सर्विसेज लिमिटेड (आरआईएसएल) ने एक समाधान निकाला: उसने एक ‘रिक्वेस्ट लॉगर‘ पोर्टल बनाया और केवल इसी के ज़रिए संवाद करने के निर्देश दिए.
जयपुर स्थित ऑरियनप्रो कंपनी, जो राजस्थान सरकार के लिए जन आधार डेटाबेस आदि पर काम करती हैं, के कर्मचारी ने बताया, ‘हमें पहले रोज़ाना 400 से 500 शिकायतें मिलती थीं. अब ये शिकायतें घटकर लगभग 100 रह गई हैं.‘
आईटी विभाग समस्याओं को मुख्यतः आधार या जन आधार से संबंधित बताता है. जैसे ई–केवाईसी (बैंकों में प्रचलित इलेक्ट्रॉनिक ‘नो योर कस्टमर’ सत्यापन प्रक्रिया) के बाद नाम की स्पेलिंग, लिंग या उम्र में त्रुटियां, आधार के पेंशन रिकॉर्ड में दोहराई गई हैं, या एक ही मोबाइल नंबर कई जन आधार आईडी रिकॉर्ड में लिंक हो गया है.
आईटी विभाग के अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए ‘एल्गोरिदम’ जांच का प्रयोग भी शुरू कर दिया है.
लेकिन नौ लाख से ज़्यादा पेंशनभोगियों के साथ धोखाधड़ी के जो मामले पकड़े गए, वे बेहद कम थे– बस मुट्ठी भर. ‘हमें करोली या दौसा ज़िलों में 7-8 ऐसे लोग मिले जिन्होंने जालसाज़ी की और इस तरह खुद को पेंशन पाने लायक दिखाया.‘
मशीनों द्वारा निर्णय का युग
राजस्थान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को इस प्रक्रिया में शामिल करने की तैयारी हो रही है, जिससे पेंशन रजिस्ट्री जैसी सूचियों से लाभार्थियों की पहचान कर और अपात्र लोगों को हटाया जा सकेगा.
अधिकारियों का कहना है कि लाभार्थियों के डेटा का उपयोग ‘राजस्थान डेटा एक्सचेंज’ बनाने के लिए किया जाएगा, जहां सार्वजनिक योजनाओं के डेटासेट कंपनियों और शोधकर्ताओं को एक निश्चित शुल्क पर उपलब्ध कराए जाएंगे. 2024-25 के बजट में, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने इसके निर्माण के लिए 150 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा की थी.
इस प्रक्रिया की देखरेख कर रहे एक अधिकारी ने कहा, ‘निजी कंपनियों के लिए यह डेटा सोने की खान है. कंपनियां जानना चाहती हैं कि अपने उत्पाद कैसे पेश करें, बिज़नेस मॉडल कैसे बनाएं. हम ‘बिग डेटा‘ का मुद्रीकरण करना चाहते हैं. यह वैसा ही होगा जैसे आप अमेज़न वेस्बाइट से ऑनलाइन खरीदारी करते हैं और फिर उसके लिए भुगतान करते हैं. इसी तरह, यहां आप किसी ज़िले के डेटा सेट चुनते हैं और अपनी पसंद के मापदंडों, जैसे आय, शिक्षा, के आधार पर डेटा के लिए भुगतान करते हैं.‘

इस जनवरी में आईटी विभाग की आरआईएसएल ने ऐसी एल्गोरिथम प्रणाली बनाने के लिए पांच साल के अनुबंध हेतु बोली लगाने हेतु सात कंपनियों को आमंत्रित किया. इन कंपनियों में आईबीएम इंडिया, एक्सेंचर सॉल्यूशन, डेलॉइट टूश तोहमात्सु, ईवाई (अर्नस्ट एंड यंग), जापान की एनईसी इंडिया कंपनी, कोफोर्ज, और किंड्रिल शामिल थीं.
टेंडर दस्तावेज़ के अनुसार, सरकार पहले से ही निवासियों से 66 विशेषताओं (जिनमें से 22 अनिवार्य हैं) के बारे में जन आधार जानकारी एकत्र करती है -उनके परिवार के सदस्य कौ न हैं, उनकी आय, व्यय. सरकार ने कंपनियों को बड़े पैमाने पर यह डेटा का उपयोग करने के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें 117 सूचना विभागों द्वारा रखे गए निवासियों के व्यापक डेटा के साथ-साथ उनके परिवारों और व्यवसायों के प्रोफाइल को मिला कर उन सबका ‘डिजिटल प्रोफाइल’ तैयार किया जायेगा.
लक्ष्य यह है कि आने वाले तीन वर्षों में यह मशीन लर्निंग सिस्टम पेंशन सूची जैसी सामाजिक कल्याण रजिस्ट्री तैयार करेगा. ये कंपनियां प्रोफाइल बनाने के लिए नागरिकों और उनके परिवारों की दी गई जानकारी का मिलान करेंगी.
सरकारी दस्तावेज़ में कहा गया है कि ये ‘360 डिग्री प्रोफाइल’ निवासियों के ‘स्वर्णिम रिकॉर्ड’ बनेंगे. इसमें दावा किया गया है कि डेटा प्रोफाइल का उपयोग नागरिकों के बारे में ‘प्रमाण के एकमात्र स्रोत’ के रूप में किया जाएगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर सवाल बने हुए हैं कि क्या कल्याणकारी क्षेत्र में एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया जाना चाहिए भी या नहीं. एआई को अक्सर एक तरह के गणितीय ‘ब्लैक बॉक्स‘ के रूप में देखा जाता है, जिसमें न तो डेवलपर और न ही कल्याणकारी लाभार्थी बता सकते हैं कि एआई किसी निर्णय पर कैसे पहुंचा.
हाल ही में एमआईटी टेक रिव्यू के एक लेख में ‘एल्गोरिदमिक कदाचार‘ का उल्लेख किया गया है. लेकिन सरकार अपात्रों को हटाने, पात्रता मानदंड निर्धारित करने, और पात्रता साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज़ों का निर्धारण करने के लिए एआई का उपयोग करना चाहती है.
आईटी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘एआई और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कल्याणकारी कार्यों को हमारी मौजूदा उपलब्धियों से कहीं आगे ले जा सकता है. जब निवासी पात्र हो जाएगा, तो उसे आवेदन करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और उसकी पेंशन अपने आप शुरू हो जाएगी.‘
अधिकारी स्वीकारते हैं कि वे किसी भी लाभार्थी के बारे में निश्चितता से नहीं कह सकते कि यह बिल्कुल सही है, क्योंकि ई–मित्र है, जो गांव का कियोस्क चलाता है और जो रिकॉर्ड सुलभ करवाता है, उसने खुद को भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों और निवासियों के बीच एक एजेंट के रूप में बदल लिया है. ‘मात्र 500-1,000 रुपये में, वह किसी के लिए भी कुछ भी कर सकता है.‘
अधिकारी ने कहा कि सरकार ई–गवर्नेंस एजेंटों की संख्या एक–चौथाई से भी कम कर देगी, या ई–गवर्नेंस के प्रबंधन के लिए कम बड़ी फर्मों को नियुक्त करेगी.
सिकुड़ती सामाजिक सुरक्षा
कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये सारे बदलाव तब हो रहे हैं हाशिए पर धकेले गए लोगों के लिए चलाई जा रही योजनाओं को ‘खैरात, रेवड़ी,या मुफ्तखोरी’ कहकर बदनाम किया जाता है. सामाजिक सुरक्षा बजट स्थिर या कम हो गए हैं. केंद्र सरकार लाभार्थियों का निर्धारण करने के लिए 2001 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करती है, जबकि जरूरतमंद लोगों की संख्या बढ़ी है.
पेंशन परिषद के रिज़वान अहमद ने बताया कि यह योजना केंद्र प्रायोजित है और राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के योगदान के बराबर योगदान देना होता है. उन्होंने बताया कि 2014 से 2025 के बीच इस योजना के लिए केंद्र सरकार का आवंटन 10,547 करोड़ रुपये से घटकर 9,562 करोड़ रुपये रह गया.
सामाजिक कार्यकर्ता दवा करते हैं की प्रशासनिक दक्षता की आड़ में राजस्थान और तेलंगाना जैसी राज्य सरकारों ने सत्ता को और केंद्रीकृत करने और कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करने के लिए सॉफ्टवेयर उपकरणों का इस्तेमाल किया.
राजस्थान के नागरिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि तकनीक पर आधारित समाधान ने योजनाओं को तबाह कर दिया है, जबकि सरकार और कंपनियों का ध्यान केवल निवासियों के बारे में अधिक से अधिक डेटा प्राप्त करने पर सिमट गया है.
‘चाहे आधार हो, जन आधार हो या एआई, ऐसा लगता है कि उद्देश्य सभी मानवीय हस्तक्षेप को हटाकर केवल तकनीक पर निर्भर करना है. यह जवाबदेही से बचने का एक प्रयास है,’ इंजीनियर और कार्यकर्ता विनीत भांभू ने कहा.
‘ऐसा लगता है कि मशीन तय करेगी – क्या यह व्यक्ति वही है जो वह खुद के बारे में कह रहा है?‘
(अनुमेहा यादव स्वतंत्र पत्रकार हैं, श्रम और ग्रामीण नीति पर केंद्रित रिपोर्टिंग करती हैं.)
(यह रिपोर्ट पुलित्जर सेंटर के सहयोग से की गई है. अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)